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कान के संक्रमण और घरेलू उपचार

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विभिन्न प्रकार के बैक्टीरिया या वायरस कान के घाव या संक्रमण का कारण बन सकते हैं। यह बाहरी कान (तैराक वर्ष), मध्य कान (ओटिटिस मीडिया) या भीतरी कान (रोलैंड) पर हो सकता है। लेकिन संक्रमण मध्य कान में अधिक होता है। बच्चों में कान के घाव सबसे अधिक बार होते हैं क्योंकि उनकी यूस्टेशियन ट्यूब आकार में छोटी होती हैं। एक बच्चे के रूप में, ईयरवैक्स, बलगम, फेफड़ों की सूजन, धुएं, और हवा के दबाव में परिवर्तन आसानी से बच्चों के कानों को अवरुद्ध करते हैं। न केवल बच्चे को कान के संक्रमण से संक्रमित किया जाता है, बल्कि वयस्कों को भी।

संकेत

हर कान की चोट बस कुछ के साथ शुरू होती है, आप यह भी नहीं देख सकते हैं कि आपका कान संक्रमित होने जा रहा है।

  • कान में दर्द या बेचैनी महसूस होना आम लक्षण हैं।
  • कान के अंदर का तापमान भी थोड़ा अधिक है (5 डिग्री फ़ारेनहाइट के भीतर)।
  • नींद में खलल पड़ सकता है।
  • बच्चे बिना किसी स्पष्ट कारण के रोते हैं।
  • कान इस बात के लिए तैयार हैं कि वे किस बात से परेशान हैं।

कान के अंदर देखो

पहली बात यह देखने के लिए है कि क्या कान के अंदर घाव के कोई लक्षण या लक्षण दिखाई देते हैं। आप इसे आटोस्कोप की मदद से घर पर भी पा सकते हैं। इसे स्वयं करना कठिन है, इसलिए अपने किसी करीबी की मदद लें। और अगर आप बच्चे के कान का परीक्षण करना चाहते हैं, तो यह आसान है। आपको यह भी पता होना चाहिए कि कान कैसा दिखता है।

कुछ ऑटोस्कोप स्वस्थ कान और संक्रमित कान के उदाहरण प्रदान करते हैं। इसके अलावा, यदि आप ऑनलाइन चाहते हैं, तो आप देख सकते हैं कि एक संक्रमित कान कैसा दिखता है। आपको जो महत्वपूर्ण चीज देखने की जरूरत है, वह यह है कि अंदर लाल है या सूजा हुआ है। कान भी सूज सकता है और इसके आसपास के ऊतक।

समझने के लिए जितना अधिक लाल और सूजा हुआ है, संक्रमण का स्तर उतना ही अधिक होगा। एक और महत्वपूर्ण बात ध्यान में रखना है कि क्या एक उभार दिखाई दे रहा है या यदि कान के पर्दे पर विखंडन (छोटा रिसाव) है। यदि आप अपने कान के अंदर कोई भी स्थिति देखते हैं, तो आपके पास दो विकल्प होंगे। मामूली समस्याओं के लिए घर पर कान का इलाज किया जा सकता है। हालांकि, यदि आप एक स्क्रीन या स्क्रीन देखते हैं, तो आपको डॉक्टर के पास जाना चाहिए।

सामान्य चिकित्सा उपचार

जब कान संक्रमित होता है, तो मूल रूप से आंख के तीन क्षेत्र होते हैं।

  • घाव
  • सूजन
  • दर्द

उपचार आपके बच्चे की उम्र, कान की चोट की सीमा और स्वास्थ्य स्थितियों पर निर्भर करेगा। यदि कोई हल्का घाव है और उसके जीर्ण होने की संभावना नहीं है, तो डॉक्टर आपको घर भेज देंगे। एक साधारण दर्द निवारक खाने की सलाह दी जाती है यदि यह 3-5 घंटों के भीतर काम नहीं करता है, तो आप एंटीबायोटिक दवाओं को लिखेंगे। आप चाहें तो घर पर प्राकृतिक कान के घावों का भी इलाज कर सकते हैं।

इस तरह से कर लो

ऐसे पौधों का उपयोग करने से जिनमें लाभकारी तत्व होते हैं, हमारा शरीर स्वस्थ अवस्था में चला जाता है और कुछ बीमारियों से छुटकारा दिलाता है। यह औषधीय पौधे या आवश्यक तेल हो सकते हैं। हमारी बीमारियों को मिटाने के लिए कई विभिन्न प्रकार की वनस्पति सामग्री का उपयोग किया जा रहा है। यहाँ कुछ व्यंजनों हैं जो आपके कान के संक्रमण को ठीक कर सकते हैं।

हर्बल राइस पैक

यह सबसे सरल तरीकों में से एक है। जब आपके बच्चे को कान में दर्द हो रहा हो, तो आप उसके कान के बाहर गर्म कर सकते हैं। और इसीलिए हर्बल राइस पैक सबसे उपयुक्त है। न केवल यह सस्ता है, DIY अरोमाथेरेपी चावल के बैग भी बनाने में आसान हैं।

सबसे पहले हर्बल राइस पैक को माइक्रोवेव या ओवन (कम तापमान पर) में गर्म करें। यदि आप स्पर्श को गर्म महसूस करते हैं, तो इसे तुरंत बाहर निकालें। इसे 3-5 मिनट के लिए संक्रमित कान पर रखें, इसे आवश्यकतानुसार 2-3 बार करें। यह गर्मी ठंडी होती है और इससे कान के हिस्से (Romm, 2000) में सर्कुलेशन बढ़ता है।

हाइड्रोजन पेरोक्साइड बूँदें

हाइड्रोजन पेरोक्साइड का उपयोग पूरे शरीर में विभिन्न घावों के लिए किया गया है, विशेष रूप से चरम सीमाओं पर। यदि आप कान के संक्रमण में पेरोक्साइड का उपयोग करना चाहते हैं, तो बस प्रभावित कान के अंदर हाइड्रोजन पेरोक्साइड को कुछ बूँदें दें।

2-3 मिनट प्रतीक्षा करें। फिर सिर को झुकाएं और कान से पेरोक्साइड को गिराएं। अब शुद्ध पानी से कान को धीरे से रगड़ें। ऐसा दिन में 2-3 बार करें।

आवश्यक तेल वर्ष ड्रॉप

प्लांट थेरेपी KidSafe Synergy Blend जो प्रदान करता है Ear Ease. यह एक वाहक तेल के साथ कुछ acneal तेलों का मिश्रण है और इसका उपयोग शरीर में किसी भी प्रकार के घाव को ठीक करने के लिए किया जाता है। घाव का इलाज सीधे कान के माध्यम से किया जाता है। यदि कान की स्क्रीन में रिसाव के अलावा कोई समस्या है, तो थोड़ी मात्रा में तेल का उपयोग करके घाव को ठीक करना संभव है।

प्याज की पुल्टिस

प्राचीन काल से, प्याज के पोल्टिस का उपयोग विभिन्न उपचारों जैसे कि संक्रमण, रक्त के थक्के और गर्म ऊतक उपचार के लिए किया जाता है। प्याज उत्तेजक के रूप में कार्य करते हैं और ऊतकों में परिसंचरण बढ़ाते हैं, बाधाओं को तोड़ते हैं और शरीर को गर्म करते हैं।

इसका उपयोग रक्त के थक्कों को कम करने, खांसी को कम करने, गुर्दे या मूत्राशय के क्षेत्र में संक्रमण को रोकने के लिए भी किया जाता है। अनियन पुल्टिस भी गले में खराश के साथ कान के दर्द को कम करने में सक्षम है। प्याज के पुल्टिस या प्याज बनाने की प्रक्रिया सरल है। इसे ऑनलाइन देखें।

हर्बल ईयर ड्रॉप

कान के दर्द से राहत के लिए हर्बल इयर ड्रॉप्स भी बहुत उपयोगी होते हैं। आप “कान ओवी” की खोज करके नुस्खा पा सकते हैं। दिन में कुछ बार इसका इस्तेमाल करने से कान के दर्द से राहत मिलेगी।

हालांकि, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि यदि कान छिदवाया गया है या कान के पर्दे पर कोई छेद दिखाई देता है, तो इसमें देरी नहीं की जा सकती। फिर डॉक्टर से परामर्श करना जरूरी है।

आनुवंशिक कोड नहीं, लेकिन आसपास की स्थिति ज्यादातर बीमारियों के लिए जिम्मेदार है

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हालांकि बीमारी जीवन का अभिन्न अंग है, हर कोई स्वस्थ जीवन जीना चाहता है। इस अध्ययन का कोई अंत नहीं है कि लोग विभिन्न बीमारियों से संक्रमित क्यों हैं। हाल ही में चिकित्सा वैज्ञानिकों के एक समूह ने ऐसे विषय पर अपने शोध के परिणामों को प्रकाशित किया। उनका विषय मुख्य रूप से विभिन्न मानव रोगों, डीएनए कोड या ज़िप कोड के लिए जिम्मेदार था? यही है, क्या मनुष्य के गुणसूत्र या आनुवंशिक लक्षण उनकी बीमारी या आसपास की स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं?

हार्वर्ड मेडिकल स्कूल और क्वींसलैंड विश्वविद्यालय के कुछ सबसे प्रसिद्ध चिकित्सा वैज्ञानिक इस शोध के लिए एक साथ शामिल हुए। वे जानकारी इकट्ठा करने और रिकॉर्ड करने के लिए जुड़वां बच्चों का दुनिया का सबसे बड़ा डेटाबेस बनाते हैं। डेटाबेस लगभग 3 मिलियन लोगों के डेटा को रिकॉर्ड करता है। उनमें से लगभग 5,000 बच्चे जुड़वां बच्चे हैं। अध्ययन की सुविधा के लिए, उन्हें लगभग 5 प्रकार के वातावरण में रखा जाता है।

दो जुड़वां बच्चे जो जन्म के समय नेत्रहीन हैं; Source:
The Sun

आइडेंटिकल ट्विन के जुड़वा बच्चों का आनुवंशिक कोड लगभग समान होता है, और जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं, उनकी पृष्ठभूमि की स्थिति भी वैसी ही होती है। इसलिए, इस परीक्षण के लिए ऐसे जुड़वां बच्चों की जानकारी भी एकत्र की जाती है। स्वास्थ्य, रोग, रोग के कारणों, विभिन्न व्यवहारों, अभिव्यक्तियों आदि का अध्ययन करना आसान होगा। चिकित्सा वैज्ञानिकों के अनुसार, कुछ वंशानुगत बीमारी के बिना, कोई भी मानव रोग कभी भी आनुवंशिक या पर्यावरणीय कारणों से नहीं होता है। दोनों रोग किसी भी बीमारी में भूमिका निभाते हैं।

क्रोमोसोमल असामान्यताएं या असामान्यताएं, रंग अंधापन आदि जैसे रोग पूरी तरह से विरासत में मिले हैं। लेकिन अन्य बीमारियां वंशानुगत कारकों, साथ ही आसपास की स्थितियों के लिए जिम्मेदार हैं। इस तरह की डायबिटीज आनुवंशिकता के कारण हो सकती है। लेकिन अगर आपके खाने की आदतें स्वस्थ और सेहतमंद हैं, तो बीमारी विकसित होने का खतरा बहुत कम हो जाता है या मधुमेह समय से पहले या जल्दी नहीं होता है। लेकिन अगर आपके खाने की आदतें अस्वास्थ्यकर और सही तरीके से नहीं हैं, तो समय से पहले मधुमेह होने की संभावना है, भले ही परिवार में किसी को मधुमेह न हो।

अध्ययन के परिणाम नेचर जेनेटिक्स जर्नल में प्रकाशित किए गए थे। यह बताया गया है कि लगभग 1 प्रतिशत बीमारियां जो आमतौर पर लोगों को होती हैं जब वे बड़े होते हैं तो आनुवंशिक कोडिंग और वंशानुगत कारणों से होती हैं। हालांकि, राशि व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में भिन्न होती है। लेकिन शेष 5 प्रतिशत बीमारी व्यक्ति के वातावरण – जलवायु, प्रदूषण, सामाजिक आर्थिक स्थिति आदि के कारण होती है। आसपास की स्थिति भी एक व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता, हितों और खाने की आदतों को संदर्भित करती है।

हालांकि, ज्यादातर मामलों में, आनुवांशिक कोड और वंशानुगत कारक आंखों की समस्याओं, बुद्धि की क्षमता, बौद्धिक अक्षमता, युवा लोगों में विभिन्न असामान्यताएं (3-5 वर्ष) जैसी विभिन्न बीमारियों के लिए जिम्मेदार हैं। लेकिन समय से पहले मोटापे के कारण, लाइम रोग जैसे संक्रमण, न केवल आनुवंशिक हैं, बल्कि आसपास की स्थिति भी है।

अल्जाइमर रोग से पीड़ित रोगी; Source: AARP

आनुवंशिकता के कारण बुद्धि की विकलांगता अधिक होने की संभावना है। आज भी, ग्रामीण इलाकों में, बुद्धि के अभिशाप को अभी भी अभिशाप माना जाता है। हालांकि वंशानुगत बीमारी को संयोजी ऊतक रोग या अस्थि मज्जा असामान्यता माना जाता है, यह दिखाया गया है कि रोगी वंशानुगत कारण से खाने के लिए अधिक जिम्मेदार है। 42 प्रकार की आंखों की समस्याओं में से लगभग 20 को आसपास की स्थितियों के कारण पाया गया है।

आनुवांशिक कारण न्यूरोलॉजिकल समस्याओं जैसे कि बुरे सपने, ग्लूकोमा, आदि के लिए जिम्मेदार होते हैं। हालांकि, अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, यांत्रिक जीवन, विटामिन ए की कमी, आदि के उपयोग से रोग अधिक तेज होता है। दूसरी ओर, व्यक्ति की जीवनशैली और खान-पान भी आंखों की रोशनी की कमजोरी, लंबे समय तक दृष्टिहीनता, अल्प-दृष्टि, मोतियाबिंद आदि के लिए जिम्मेदार होते हैं।

हालांकि, वंशानुगत कारक विभिन्न प्रजनन अंगों के कारण में एक प्रमुख भूमिका निभाते हैं। जैसे बांझपन, अनैच्छिक गर्भपात आदि। फिर, डिम्बग्रंथि पुटी के लिए अन्य कारण जिम्मेदार हैं, एक बार जानबूझकर गर्भपात, बाद में अनैच्छिक गर्भपात, आदि। उदाहरण के लिए, अतिरिक्त और लंबे समय तक गोली खेलने के बाद, बच्चा पैदा करने की क्षमता बाद में कम हो जाएगी और गर्भपात हो सकता है। फिर, अधिक तेल-वसा वाले खाद्य पदार्थ खाने से गर्भाशय में अल्सर होने की संभावना अधिक होती है।

चिकित्सा वैज्ञानिकों ने 4 विभिन्न रोगों में से 3 के कारण के रूप में सामाजिक आर्थिक स्थिति को दोषी ठहराया है। वायु प्रदूषण से केवल 5 ऐसे रोग हो सकते हैं। इसके अलावा, तापमान में परिवर्तन के कारण इस प्रकार की बीमारियां हो सकती हैं। अत्यधिक अस्वास्थ्यकर वसा का सेवन विभिन्न बीमारियों जैसे कि समय से पहले वजन बढ़ना, मधुमेह, आदि के कारण हो सकता है।

इस अध्ययन के परिणामस्वरूप संक्रामक बीमारी का वारिस होना संभव नहीं है। एक स्वस्थ वातावरण और जीवनशैली कई बीमारियों से छुटकारा दिला सकती है। इसलिए, स्वस्थ और स्वस्थ जीवन जीने के लिए उचित खान-पान को अपनाना चाहिए, साथ ही पर्यावरण को स्वच्छ और साफ रखने की कोशिश करनी चाहिए।

खाने के तुरंत बाद शौच करने की प्रवृत्ति क्यों है?

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ऐसे कई लोग हैं जो खाने को ख़त्म करने के लिए मल को छोड़ने की ज़रूरत महसूस करते हैं। तब उसे लग सकता है कि वह जो भोजन कर रहा है, वह सीधे बाहर जा रहा है। ऐसी बात नहीं है। वास्तव में, एक व्यक्ति को भोजन-उपभोग वाले आहार के माध्यम से चयापचय को पूरा करने और इसे एक मॉल में बदलने में लगभग 1 – 2 दिन लगते हैं। इसलिए, यदि आपके पास खाने के बाद आंत्र आंदोलन होता है, तो यह भोजन से कम से कम एक या दो दिन पहले होता है।

इसका एक मुख्य कारण गैस्ट्रोकॉलिक रिफ्लेक्स है। जिसका अर्थ है कि जब भोजन पेट में प्रवेश करता है, तो पेट एक सामान्य प्रतिक्रिया दिखाता है। लेकिन कुछ लोगों में, प्रतिक्रिया की तीव्रता देखी जा सकती है और समस्या बंद हो जाती है। इस लेख में, हम वास्तव में चर्चा करेंगे कि क्या होता है जब कोई व्यक्ति समस्याओं का सामना कर रहा है और उचित जीवन प्रथाओं के माध्यम से इस समस्या को कैसे दूर कर सकता है।

क्या यह सामान्य है और ऐसा क्यों होता है?

पेट में प्रवेश करने के बाद गैस्ट्रोकॉलिक रिफ्लेक्स या गैस्ट्रोकॉलिक प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है, जो आमतौर पर एक अनैच्छिक प्रतिक्रिया होती है। जब भोजन इस हिस्से तक पहुंचता है, तो शरीर एक हार्मोन जारी करता है जो बृहदान्त्र के संकुचन का कारण बनता है।

इन संकुचन के परिणामस्वरूप, पहले खाया गया भोजन परिपक्वता के माध्यम से एक मल के रूप में बाहर आना चाहता है। ज्यादातर लोगों में, गैस्ट्रोकॉलिक प्रतिक्रिया मध्यम गुणवत्ता की होती है, इसलिए कोई असुविधा नहीं होती है। लेकिन कुछ लोगों के लिए, यह पलटा तीव्र है, जिसके परिणामस्वरूप खाने के तुरंत बाद मल को छोड़ने की इच्छा है।

उस कारण से गैस्ट्रो-कोलिक रिफ्लेक्स प्रभावित हो सकता है

कुछ स्वास्थ्य समस्याएं, जैसे चिड़चिड़ा आंत्र सिंड्रोम (IBS), इस पलटा को प्रभावित कर सकता है, जिससे भूख ज़रूरत से ज़्यादा तेज़ हो सकती है। सामान्यता से परे जाकर, किसी व्यक्ति को इसके कारण तेजी से शौच होने का खतरा हो सकता है:

  • खाद्य एलर्जी और खाद्य असहिष्णुता
  • चिंतित
  • Gyastritisa
  • सीलिएक रोग
  • सूजन आंत्र रोग (आईबीडी)
  • क्रोहन रोग

उपरोक्त में से कोई भी गैस्ट्रोकॉलिक रिफ्लेक्स की गंभीरता को बढ़ाने का कारण बनता है, खाने के बाद उत्सर्जन के लिए अग्रणी। पाचन से संबंधित अन्य लक्षण हो सकते हैं। उदाहरण के लिए:

  • उत्सर्जन के बाद पेट की गैस में सूजन या कमी हुई
  • तेजी से गैस छोड़ने की प्रवृत्ति
  • पेट में दर्द या बेचैनी
  • श्लेष्मा का मल छोड़ना
  • दस्त
  • कब्ज

खाने के बाद गैस्ट्रिक रिफ्लेक्स बनाम दस्त

दस्त की तुलना अक्सर गैस्ट्रिक रिफ्लेक्स से की जाती है। लेकिन दस्त एक ऐसी स्थिति है जो आमतौर पर दो से तीन दिनों तक रहती है। लेकिन अगर यह एक सप्ताह या उससे अधिक समय के लिए है, तो आपको यह समझने की आवश्यकता है कि आप बहुत खतरे में हैं।

यदि परिपक्वता की कोई समस्या है, तो उचित उपचार की तलाश करें

यदि आपको पेट की अन्य समस्याओं के लिए खाने के बाद कब्ज है, तो आपको हमेशा डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए। लक्षणों की अवधि और समस्या की गंभीरता के आधार पर, डॉक्टर आपकी शारीरिक स्थिति का आकलन करेंगे और आवश्यक उपचार की व्यवस्था करेंगे।

यदि कोई समस्या है जो गुदा उत्तेजना को उत्तेजित करती है, तो आप इसे सही करके समस्या से छुटकारा पा सकते हैं।फूड डायरी बनाने से किसी के लिए भी यह पता लगाना आसान हो जाएगा कि कौन से खाद्य पदार्थ गैस्ट्रोकॉलिक रिफ्लेक्स बढ़ाते हैं। डायरी में वह शामिल है जो वह खा रही है और परिणामस्वरूप पेट कैसे प्रतिक्रिया करता है। एक बार तय करने के बाद, व्यक्ति समझ जाएगा कि उसे कौन से खाद्य पदार्थ खाने चाहिए और कौन से नहीं।

भावनात्मक तनाव को कम करें

कुछ लोगों में, चिंता या भावनात्मक तनाव गैस्ट्रोकोलिक रिफ्लेक्स की गंभीरता को बढ़ा सकते हैं। उस स्थिति में, उन्हें अपना मानसिक तनाव कम करना चाहिए और इससे लाभ होगा। तनाव कम करने के लिए शारीरिक परिश्रम और नियमित ध्यान जैसे कुछ कदम उठाना संभव है।

निम्नलिखित खाद्य पदार्थ खाने से, आप पेट खराब से छुटकारा पा सकते हैं या तेजी से शौचालय जा सकते हैं

  • केला: केले में पेक्टिन होता है जो आंतों के कचरे को हटाने में मदद करता है।
  • पपीता: पपीता में खेलने से परिपक्वता को बढ़ावा मिलता है, पाचन समाप्त होता है और कब्ज और जकड़न से राहत मिलती है।
  • सफेद चावल: अगर ऑयली खाद्य पदार्थों के साथ कोई समस्या है, तो आपके पेट में असुविधा होने पर सफेद भोजन, जैसे सफेद चावल, टोस्ट या तला हुआ आलू लेना सबसे अच्छा है।
  • अदरक: अदरक एक पाचन सहायता है और मतली को ठीक कर सकती है।
  • दही: ज्यादातर डेयरी खाद्य पदार्थ पेट के लिए हानिकारक होते हैं, लेकिन एक कटोरी सादे दही को उल्टा कर दिया जाता है।

शरीर में आयरन की कमी को कैसे करें पूरा

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मिनरल्स, विटामिन, प्रोटीन जैसे पोषक तत्व शरीर को स्वस्थ बनाये रखने में मदत करते हैं। इनकी कमी होने से व्यक्ति को कई बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है। अन्य विटामिन्स और मिनरल्स की तरह ही आयरन भी शरीर के लिए अति आवश्यक है। आयरन शरीर को स्वस्थ रखने,तथा लाल रक्त कोशिकाओं में ऑक्सीजन को ले जाने का काम करता है। शरीर में अगर आयरन का स्तर बहुत ज्यादा गिर जाए तो इससे खून की कमी भी हो सकती है। जब ऐसा होता है तो लाल रुधिर कोशिकाए सामान्य से छोटी हो जाती है इसके कारण किडनी, कैंसर, कुपोषण, विटामिन बी, एनीमिया जैसी कई समस्याएं होती हैं।

Pic: dailyhunt

आयरन की कमी अधिकतर महिलाओं में देखने को मिलती है। पौष्टिक आहार न लेने से या किसी बीमारी के कारण आयरन की कमी होने लगती है। आयरन की कमी की पूर्ति के लिए आपको अपने आहार में ऐसे खाद्य पदार्थ शामिल करना चाहिए जिनमें आयरन की मात्रा अधिक हो। ऐसे ही कुछ खाद्य पदार्थों के नाम निचे दिए जा रहे हैं

शरीर में आयरन की कमी का लक्षण
शरीर में आयरन की कमी को बहुत ही आसानी से पहचानी जा सकती है। जैसे कई बार ऐसा होता है कम काम करने पर ज्यादा थकान लग जाती है, नींद को पूरी करने पर भी थकान महसूस होता है। इन लक्षणों का मतलब शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर कम हो रहा है यानी की शरीर को आयरन की पूर्ति बराबर नहीं हो पा रही है। हीमोग्लोबिन की कमी यानी खून की कमी, आयरन की कमी ज्यादातर नवजात, किशोर और गर्भवती महिलाओं में में देखने को मिलती है। खून की कमी होते ही चेहरा और नाखून पीले दिखने लगते है।आयरन की कमी के लक्षण थकान , सांस फूलना , असामान्य सफ़ेद त्वचा, चक्कर आना,सिर में दर्द रहना,अनियमित मासिकधर्म,एकाग्रता में कमी, बालों का झड़ना आदि संकेत नजर आते है।

आयरन की कमी कैसे करें पूरी – आयरन की कमी कभी भी किसी को भी और किसी भी उम्र में हो जाती है। इसलिए अपने आहार में बदलाव जरूर लाए। आयरन की कमी का निदान करने के लिए खून बढ़ाने वाले आहार का चयन करे। भोजन में चोकरयुक्त आटा, मल्टीग्रेन आटा, काबुली चना, अंकुरित अनाज, हरी पत्तेदार सब्जियाँ, संतरा का रस, राजमा, सोयाबीन, हरी मुंग व मसूर दाल, सूखे मेवे, गुड, अंगूर, अमरूद, अंडा व दूध, मेथी दिनचर्या में शामिल करते हैं तो जल्दी ही आप आयरन की कमी को दूर कर सकते हैं।

ये आहार हैं आयरन से भरपूर
मुनक्का -जो लोग मांस-मछली नहीं खाते वो मुनक्का से आयरन और विटामिन बी की जरूरतों पूरा कर सकते हैं। खाने से पहले मुनक्के को पानी से अच्छे से धो लें।

Pic: rd

काजू– काजू सबसे ज्यादा स्वादिष्ट होने के साथ -साथ हेल्दी भी होता है। 10 ग्राम काजू में 0।3 मिलीग्राम आयरन होता है। काजू में ये भी तत्व पाए जाते हैं जैसे पोटेशियम, मैग्नीशियम,फास्फोरस। इसके आलावा प्रोटीन और फाइबर का भी स्रोत है काजू। विटामिन ई, विटामिन बी 6 की भी मात्रा पायी जाती है।

पालक – पालक में विटामिन बी6, ए, सी आयरन, कैल्शियम और फाइबर भरपूर मात्रा में पाया जाता है। पालक की सब्जी या जूस बनाकर भी पी सकते हैं। इसका सेवन करने से शरीर में किसी भी पौषक तत्व की कमी नहीं होती।

जामुन और आंवला– जामुन और आंवला के रस को बराबर मात्रा में मिलाकर पीने से शरीर में खून की कमी नहीं होती है। हमीग्लोबिन की कमी को पूरा करने के लिए लगातार 1 हफ्ते तक इसका सेवन करें।

Pic: ndtv

ब्रोकली -गोभी की तरह दिखने वाली हरे रंग की ब्रोकली में आयरन के अलावा विटामिन सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। ब्रोकली को खाने से आपका इम्यूनिटी सिस्टम बनता है।


चुकंदर– एक गिलास चुकंदर के जूस में एक चम्मच शहद मिक्स करके रोजाना पीने से भी शरीर में आयरन की कमी पूरी हो जाती है। इसके अलावा गुड़ के साथ मूंगफली को मिलाकर खाने से भी शरीर में आयरन की कमी नहीं होती हैं।

थोड़ी सी सावधानी से बचा जा सकता है अवसाद से

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अवसाद एक गंभीर बीमारी है जो नकारात्मक रूप से इससे ग्रस्त व्यक्ति को प्रभावित करती है, इसकी वजह से कई लोगो को अपने जिंदगी जीने की रूचि ख़त्म होने लगती है जिसका प्रभाव व्यक्ति की कामकाज पर पड़ता है।अगर किसी को भी एक बार अवसाद (तनाव) का स्ट्रोक आ गया, तो इसके पुनरावृत्ति की सम्भावना बढ़ जाती है।

Pic: healthbeautytips

अवसाद क्या है?

अवसाद किस वजह से होता है,अभी तक ये स्पष्ट रूप से नहीं बताया जा सका है परन्तु माना जाता है कि इसके लिए कई चीजों की अहम भूमिका होती है। जैसे -लगातार उदास रहना, किसी नज़दीक़ी की मौत, नौकरी चले जाना या शादी का टूट जाना, इन कारणों से व्यक्ति के व्यवहार में भी बदलाव आते है और उसे चिड़चिड़ापन होना, बेचैनी महसूस होना, अत्यधिक रोना, गुस्सा आना तथा उनका मन सामाजिक गतिविधियों में नहीं लगता है । अवसाद से ग्रसित लोग सामाज के संपर्क से बचने के लिए बहाने बनाते है तथा अपने आप को अपराधी समझने जैसी नकारात्मक सोच उनके मन में आनी शुरू हो जाती है। इसके साथ ही उनके मन में हर समय कुछ बुरा होने की आशंका बनी रहती है तो इससे भी अवसाद में जाने का ख़तरा रहता है।
अवसाद से ग्रस्त व्यक्तियो का हमेशा सिर दर्द,किसी को भूख का ज्यादा लगना,किसी को भूख नहीं लगना, वजन का बढ़ना या कम होना, ज्यादा थकान महसूस करना, अनिंद्रा या हाइपरसोम्निया, ये सभी शारीरिक लक्षण अवसाद ग्रस्त व्यक्ति में दिखने लगते है।

अवसाद किसे हो सकता है?


Pic: shiningdaylight

यह एक छोटा सा जबाव है कि अवसाद किसी को भी किसी भी उम्र में हो सकता हैं। यह एक मस्तिष्क का विकार है।
हमारे मस्तिष्क में कई तरह के रसायन कार्य करते है इसके कारण रसायनों में चेंज या अंतर हार्मोन के स्तर में जो परिवर्तन लाते हैं उससे ही अवसाद होने का खतरा रहता है।
वैसे शोध से पता चलता है कि इसके पीछे कोई आनुवांशिक वजह भी हो सकती है। इसके तहत कुछ लोग जब चुनौतीपूर्ण समय से गुज़र रहे होते हैं तो उनके अवसाद में जाने की आशंका 70 % होती है इसके अलावा मस्तिष्क में न्यूरोट्रांसमीटर में बदलाव या कमी जिनमे सेरोटोनिन और डोपामाईन शामिल है, इनकी वजह से भी व्यक्ति अवसाद जैसे बीमारी से ग्रस्त हो सकता है।

अवसाद के लक्षण

Pic: lybrate

अवसाद के लक्षण वाले व्यक्तियों का मूड यानी मिजाज सामान्य उदासी जैसी नहीं होती बल्कि किसी भी प्रकार का काम या चीज में इनका मन नहीं लगता,किसी प्रकार की रूचि,तथा का ख़ुशी का न होना , यहाँ तक कि गम का भी अहसास नहीं होता है। हर समय व्यक्ति नकारात्मक सोच में डूबा रहता है। इसके साथ ही नींद न आना या बहुत नींद आना। रात को दो-तीन बजे नींद का खुलना और अगर यह दो सप्ताह से अधिक चले तो अवसाद की निशानी है।

अवसाद से बचाव

  • नींद को नियमित रखना
  • समय पर खाना और अच्छा खाना
  • अच्छी सोच रखना
  • सभी लोगो को तनाव होता है विचार ऐसा रखना कि इसे कैसे कम रखना हैं
  • अपने काम में मस्त और व्यस्त रहना
  • महत्वाकांक्षा को उतना ही रखना जितना हासिल करना संभव हो
  • परिवार के साथ जुड़े रहना
  • नियमित व्यायाम करना

खाली पेट चाय पीने से हो सकते हैं कई नुकशान

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चाय धीरे -धीरे भारतीय संस्कृति का हिस्सा बन गया है। भारत का कोई ऐसा घर नहीं होगा जहाँ चाय नहीं बनती हो। देश के करीब आधे से ज्यादा लोग सुबह उठने के साथ ही चाय पीना पसंद करते है। चाय पीने का कल्चर न केवल शहरों में बल्क‍ि गांवों में भी प्रचलित है । किन्तु बहुत से लोगों को चाय पीने की लत लग जाती है और वो दिन भर में कई कप चाय पी जाते हैं। अधिक मात्रा में चाय पीना हमारे सेहत के लिए हमेशा नुक्शानदायक होता है मगर समस्या तब और बढ़ जाती है जब लोग सुबह खाली पेट चाय पीने से खुद को नहीं रोक पाते हैं। सुबह खाली पेट चाय पीने से कई नुकसान तथा कई बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। हालांकि चाय को सही तरीके और सही मात्रा में पिया जाये तो इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स हमें कई फायदे भी पहुंचाते हैं । आइए आपको सुबह खाली पेट चाय पीने से नुकसान बताते हैं।

Pic: Awaaznation

दूध की चाय पीने से नुकसान – भले ही आप कैसे ही चाय पीएं अगर यह खाली पेट ली गई है यह आपको नुकसान ही होगी और खाली पेट ज्यादा दूध वाली चाय का सेवन करने से सारा दिन थकान तथा स्वभाव में चिड़चिड़ापन बना रहता है। एक और बात चाय में दूध डालते ही एंटीआक्सीडेंट का भी असर ख़त्म हो जाता है।

मिचली होना – रात को सोने के बाद से लेकर सुबह उठने तक हमारा पेट खाली हो जाता है इस दौरान सीधे चाय के पीने से पेट में या फिर श्वास नली में जलन,उल्टी आना या जी मिचलाने की समस्या का एक मूल कारण खाली पेट चाय पीना ही है, इन परेशानियों से बचने के लिए आपको चाय पीने से पहले कुछ खा लेना चाहिए

Pic: telegraph

कई बीमारियों का खतरा – कैफीन की मात्रा शरीर में कॉर्टिसोल यानी स्‍टेरॉयड हार्मोंस को बढ़ा देती है, जिससे शरीर को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।इनमें दिल से संबंधित समस्याएं, डायबिटीज़ व वजन का बढ़ना,नींद की समस्या,ब्लड प्रेशर पर असर पड़ता है, इसलिए खाली पेट चाय नहीं पीना चाहिए।

पेट का ख़राब होना तथा गैस की समस्या – प्रत्येक दिन खाली पेट चाय पीने से पाचन तंत्र का कमजोर होने का एक बड़ा कारण है। खाली पेट चाय पीने से आपकी भूख प्रभावित होती है या भूख लगनी बंद हो जाती है। चाय में दूध का इस्तेमाल होता है चूंकि दूध में लैक्टोज बहुत अधिक मात्रा में होता है इसलिए खाली पेट दूध वाला चाय के सेवन करने पर शरीर को नुकसान पहुंचता है इसके अलावा कई लोगों को गैस, और जलन करने लगती हैं ।

पोषक तत्व की कमी तथा मोटापा बढ़ना – चाय की अधिक मात्रा में पीने से शरीर में प्रोटीन और अन्य दूसरे पोषक तत्वों का अवशोषण ठीक ढंग से नहीं हो पाता है जो शरीर को प्रभावित करती है और जिससे गंभीर बीमारी होने की संभावना हो सकता है। चाय में इस्तेमाल होने वाली पत्ती और चीनी शरीर के अंदर चर्बी बढ़ाने का काम करती है जिससे वजन भी बढ़ जाता है।

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डिहाइड्रेशन – चाय में डाईयूरेटिक गुण पाए जाते है अगर आप सुबह चाय पीते है ये शरीर के लिए उपयोगी नहीं होगा क्योंकि शरीर से मौजूद पानी निकलने के साथ -साथ प्यास लगने की समस्या हो सकती है चूँकि हम जब रात को सोते है तो हमारे शरीर में मौजूद पानी की कमी रहती है इसी के कारण सुबह खाली पेट चाय के पीने से डिहाइड्रेशन होता है। इसलिए ध्यान दें कि सुबह कुछ खाने पर ही चाय पीएं।

जिम गए बिना कैसे रखें खुद को फिट

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एक स्वस्थ शरीर के लिए एक्सरसाइज करना बहुत जरूरी है। जिन लोगों के पास जिम जाने का समय नहीं है या एक्सरसाइज का समय भी नहीं निकाल पाते हैं, ऐसे में फिट एवं स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए काम के साथ -साथ दूसरी एक्टिविटीज करने से फिट एवं स्वस्थ रह सकते हैं। हम आपको बताते हैं वो फिटनेस टिप्स जिससे जिम के बिना कैसे फिट रहें।

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सुबह जल्दी उठना

बेशक सुबह-सुबह की नींद का मजा ही कुछ और होता है, इस मजे को त्यागने के फायदे भी कुछ बेहतरीन ही हैं। सुबह जल्दी उठ जाने की कोशिश करें और कम से कम 15 मिनट घर पर ही एक्सरसाइज करें। आप अगर हर दिन उसी समय पर व्यायाम करोगे तो जरूर ही कुछ ही दिनों में आपको अपने आप में बदलाव नज़र आएगा। सुबह जल्दी उठने के बाद एक्स्ट्रा टाइम मिल जाता है और उस एक्स्ट्रा टाइम में एक्सरसाइज करके अपने हेल्थ को और भी खुशनुमा बना सकते हैं। अगर आप एक्सरसाइज नहीं करना चाहते हैं तो टहलने के लिए जा सकते हैं।

टीवी देखते समय एक्सरसाइज

जब आप घर में हों और आपके पास कोई काम नहीं है या आप टीवी देख रहे हैं, तो उस समय आप एक्सरसाइज कर सकते हैं। टीवी देखते हुए आप स्‍ट्रेचिंग, योगासन और हल्की-फुल्की एक्सरसाइज कर सकते हैं। आप मनोरंजन और सेहत का बेहतरीन कॉकटेल बना सकते हैं।

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अपनी दिनचर्या में बदलाव

व्यायाम करना सेहद के लिए फायदेमंद है और अगर आप एक्सरसाइज नहीं कर पाते हैं, तो अपने स्वस्थ जीवन जीने के लिए थोड़ा बदलाव कीजिए, जिससे शरीर स्वस्थ एवं खुश रह सके। अगर आप कार से ऑफिस जाते हैं, गाड़ी को ऑफिस से थोड़ी दूर पार्क करें, ताकि आप थोड़ा पैदल चल सकें। खाना खाने के तुरंत बाद बैठे नहीं, बल्कि 15 मिनट तक टहलें. इसके अलावा छोटे-मोटे कामों के लिए नजदीक के बाजार जाना हो तो पैदल जाया करें।

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लिफ्ट का प्रयोग कम करें

आप घर, ऑफिस, मेट्रो, मॉल आदि जहां भी आप लिफ्ट का प्रयोग करते हो, उस जगह में सीढ़ियों का प्रयोग करने की कोशिश करें। अगर आप लिफ्ट की बजाय सीढ़ियों का प्रयोग करेंगे और धीरे-धीरे इसको अपनी आदत बना लेंगे तो पैदल चलकर आप काफी मात्रा में कैलोरी खर्च कर सकेंगे. साथ ही साथ आप स्वस्थ और तन्दुरुत भी रहेंगे।

पर्याप्त मात्रा में पानी पियें

स्वस्थ जीवनशैली के लिए संतुलित आहार और एक्सरसाइज के साथ पानी पीना भी बहुत जरूरी है। पानी पीने से शरीर के जोड़ और उत्तक अच्छे से काम से काम करते हैं और शरीर का तापमान भी सही रहता है और पोषक तत्‍व भी शरीर के सभी हिस्‍सों में पहुंचते हैं। वर्कआउट और चलकर आने के बाद पानी पीने पर विशेष ध्यान दें। पानी को हमेशा बैठकर और आराम से पियें।

प्याज में है गुणों का भंडार

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Red Onion

प्याज सफेद तथा गुलाबी,देखने में जितना मनमोहक होता है,उतना ही खाने में एक अलग ही स्वाद तथा खुशबू जोड़ देता है। यह खाने की रूचि, पौष्टिकता एवं स्वाद बढ़ाता है और हर तरह के शाही खाने में इसका उपयोग किया जाता हैं। स्वाद के साथ ही प्याज में कई प्रकार के खनिज तत्व एवं विटामिन होते है।जो कि हमारे शरीर के लिए उपयोगी हैं जैसे- फ्लेवोनोइड्स तथा विटामिन बी, विटामिन सी, केल्शियम, ज़िंक, पॉटेशियम, तांबा, फाइबर, सल्फर के यौगिक लोहा और कम केलोरी वाले वसा प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं, आइए आपको बताते हैं प्याज खाने के फायदें

रक्तचाप नियंत्रित तथा कोलस्ट्रोल कम करने में सहायक
प्याज में क्रोमियम (Cr) तत्व होते हैं,प्याज खाने से शरीर में रक्त के मौजूद शक़्कर के मात्रा को घटाता है। इसके सेवन करने से उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रैशर), मधुमेह (डायबिटीज) का खतरा भी कम होने के साथ -साथ रक्तचाप भी नियंत्रित रहता है। नियमित प्याज को सलाद के रूप में खाने से शरीर में बढ़ने वाले कोलेस्ट्रॉल को रोक जा सकता है।

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संक्रमण कम करे और प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाए
प्याज प्राकृतिक रूप से एन्टीबायोओटिक, एन्टीसेप्टिक है जो हमेशा ही संक्रमण से दूर रखता है। प्याज में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का गुण होता है इससे शरीर में किसी भी प्रकार की बीमारी लड़ने शक्ति मिलती तथा ये संक्रमण को रोकने में मदद करता है।

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अलसर तथा कैंसर से बचाएं
प्याज में मौजूद फ्री रेडिकल्स पेट में होने वाली परेशानी तथा अलसर से बचाते हैं उसके साथ -साथ गेस्ट्रिक अलसर (पेट में होने वाले छाले) को खत्म करने में बहुत ही लाभदायक है।
प्याज का नियमित रूप से सेवन करने से कैंसर से बचने के लिए प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और सभी प्रकार के कैंसर जैसे – कोलोरेक्टल, और ओवरियन कैंसर से भी बचाता है।

त्वचा चमकाए तथा आँखों स्वस्थ

प्याज में भरपूर मात्रा में एन्टीओक्सिडेंट्स, विटामिन ए, विटामिन सी, विटामिन ई होते हैं जो कि त्वचा के लिए लाभदायक होते हैं वही हरे प्याज विटामिन ए प्रचुर मात्रा में पायी जाती है जो आँखों की परेशानियों को दूर करने तथा शरीर में विटामिन ए की कमी से होने वाली बीमारियों से बचाने मदद करता है ।

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पाचन शक्ति बढ़ाए
प्याज के नियमित सेवन से शरीर में पाचक रस की मात्रा को अधिक बनाने लगता है,जो की पाचन सही तरिके से होता है प्याज का सेवन से स्वाद तो बढ़ाता ही है साथ ही साथ पाचन शक्ति बढ़ाने में लाभकारी होती है। आदि

प्याज को इस्तेमाल करने का यह है सही तरीका

  • प्याज में कई परतें होती हैं। उसे उपयोग करते समय हमें ध्यान देना है की प्याज का ज्यादा छीलके नहीं उतारना चाहिए। क्योकि प्याज की बाहरी परतों पर अधिक फ्लेवोनोइड्स होता है जो बहुत ही फायदेमंद होते हैं।
  • कहा जाता है सब्जियों को ज्यादा देर तक पकने से उनके पौष्टिक तत्व नष्ट हो जाते है लेकिन प्याज के सूप बनाने के लिए ज्यादा देर तक उबाला जाता है।लेकिन प्याज के पौष्टिक तत्व सूप में सही मात्रा में आए इसलिए सूप को धीमी आंच पर पकाया जाये।और बहुत ही पौष्टिक सूप तैयार हो जाता हैं ।
  • वैसे तो प्याज को कच्चे खाएं या पकाकर खाएं यह तो फायदेमंद ही होता है,परन्तु फिर भी सलाद के रूप में इस्तेमाल करने से हमारे शरीर में अधिक क्यूसेर्टिन आता हैं जो सेहत के लिए बहुत ही फायदेमंद होता है।

क्यों जरुरी है ‘विटामिन डी ‘ हमारे शरीर के लिए

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आजकल आम बात हो गई है कि हर किसी में विटामिन डी की कमी पाई जाती है जो कि हमारे स्वस्थ जीवन के लिए उचित नहीं है। हमारे शरीर को तमाम तरह के विटामिन की आवश्यकता होती है उनमें से ‘विटामिन डी’ भी बहुत महत्वपूर्ण है। दूध में प्रचुर मात्रा में विटामिन डी मिलता है। इसके साथ ही सुबह के समय मिलने वाली की धूप जिसमें विटामिन डी पायी जाती है वो भी हमारे शरीर के लिए फायदेमंद है। विटामिन डी हमारे शरीर में कैल्सियम तथा फॉस्फोरस की मात्रा को बनाने में भी सहायता करता है जिससे शरीर की हड्डियां मजबूत होती है।

Benefits of Vitamin D (Pic: youtube)

विटामिन डी के फायदे – शरीर के लिए विटामिन डी बहुत ही जरूरी होता है, दूध में लगभग सभी प्रकार के विटामिन्स पाए जाते हैं। बच्चो के लिए दूध सम्पूर्ण आहार बताया गया है क्योंकि दूध को आसानी से पचाया जा सकता है। विटामिन डी से हड्डियाँ मजबूत होती है शरीर में केल्सियम तथा फास्फोरस की मात्रा को बनाये रखने में मदद करता। इसके साथ ही इससे बीमारियों से लड़ने की ताकत मिलती है और मांसपेशियों ,नसों ,हृदय रोग , बी पी जैसे अनेक रोगों के रोकथाम में भी सहायता मिलती है। शरीर को स्वास्थ्य रखने के लिए ये सभी विटामिन जरूरी होती जो की विटामिन पांच प्रकार के होते है
विटामिन डी- 1
विटमिन डी ,-2
विटामिन डी ,-3
विटामिन डी -4
विटामिन डी -5
विटामिन डी की कमी से होने वाले रोग – विटामिन डी हमारे शरीर में एंटी – ऑक्सीडेंट जैसा काम करता है इसमें रोग को लड़ने की क्षमता होती है इसके नहीं लेने पर बच्चो में अनेक बीमारियों का सामना कारण पड़ता है ।विटामिन डी के लक्षण कुछ ऐसे होते है कि ज्यादातर लोग इन्हे परवाह नहीं करते है या तो वे दूसरी बीमारियों के जैसा ही लक्षण समझ लेते है विटामिन डी की कमी का एक मुख्य कारण है कि घर के अंदर रहना जैसे बढ़ते बच्चे खाना ठीक ठंग से नहीं खाते है जिस कारण उनको खाने में कैल्शियम और विटामिन डी नहीं मिल पाता है । बच्चो के मांसपेशियों में जकड़न हो जाता है सोते समय या चलते समय मांसपेशियों में बहुत दर्द महसूस करते है बच्चो में चिड़चिड़ा पन सभाव जैसे लक्षण पाए जाते साँस लेने में दिक्कत और अकड़न भी होने लगती है कैल्शियम की कमी से दाँत कमजोर , देर से खड़े होना , बच्चो का लेट में चलना बार -बार बीमार होना उन बच्चो को बीमारी भी जल्दी पकड़ लेता है ।

Vitamin D from Sun Light (Pic: healthyliving)

क्यों जरूरी है विटामिन डी- विटामिन डी शरीर के लिए बहुत आवश्यक है विटामिन डी हड्डियों को मजबूत बनता है। विटामिन डी का कैल्शियम के साथ बहुत बड़ा नाता है शरीर को पूर्णरूप से स्वस्थ रखने के लिए हर व्यक्ति को विटामिन डी प्रचुर मात्रा में लेनी चाहिए। विटामिन डी वासा में घुलनशील होता जो मसल्स, शरीर की इम्युनिटी बढ़ाने में सहायक होता है। इसके साथ ही शरीर के सूजन और इंफेक्शन से बचने और किडनी ,लंग्स ,लिवर हार्ट जैसे बीमारियों के होने की संभावना कोभी कम करता है। विटामिन डी की कमी का सबसे ज्यादा असर बच्चों में देखने को मिलता है जब इसकी कमी हो जाती तो उनके पैर टेढ़े -मेढ़े हो जाते हैं। इसके साथ ही महिलाओं में प्रसव के बाद अगर इसकी कमी हो जाती है तो उन्हें लगातार कमर दर्द की शिकायत रहने लगती है।

विटामिन डी के स्रोत –विटामिन डी का जो मुख्य स्रोत है यह है सूरज कि पहली किरण, हमें रोजाना कम से कम १० मिनट तक धुप सेंकना चाहिए । इसके अतिरिक्त अंडे का पीला भाग ,मछली का तेल ,दूध मक्खन विटामिन डी के मुख्य स्रोत है ऐसे। एक जरुरी बात हमें दिनभर में जितना विटामिन डी चाहिए होता है उसका २० प्रतिशत हिस्सा दूध से पूरा हो जाता है। इसीलिए इसे बच्चों के लिए सम्पूर्ण आहार बताया गया है। बच्चों के साथ ही बड़ों को भी प्रतिदिन दूध का सेवन करना चहिये।दूध के पीने से न केवल बच्चों की हड्डियां मजबूत होती हैं बल्कि इससे दिमाग भी तेज हो जाता है। इसके आलावा विटामिन डी अंडे के अंदर वाला पीला भाग तथा संतरे के रस भी हमें नियमित लेना चाहिए।

मोटापा क्या है और क्या है इससे बचाव?

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मोटापा ऐसी बीमारी है जिससे आज लगभग हर पांचवा व्यक्ति जूझ रहा है। मोटापे अपने आप में बहुत बीमारियों को आमंत्रित करता है आज की व्यस्त जीवनशैली, तनाव और खान-पान को लेकर लापरवाही मोटापे का कारण बनता जा रहा है। कुछ लोगों में मोटापा अनुवांशिक हो सकता है जबकि अधिकांश लोगों में खान – पान की गलत आदतों के कारण होता है। आइए जानतें है आखिर मोटापा क्या है? और इसका कारण एवं निवारण क्या है।

मोटापा क्या होता है– मोटापा मनुष्य के शरीर की एक ऐसी स्थिति है जब शरीर में आवश्यकता से अधिक मात्रा में वसा जमा हो जाती है ,जो की हमारे स्वास्थ्य में हानिकारक प्रभाव डालने लगती हैं। सामान्य भाषा में कहा जाता है जब व्यक्ति का वजन सामान्य वजन से ज्यादा हो जाए तो यही मोटापा कहलाता है। मोटापे से अनेक बीमारियां हो जाती है जैसे:डायबिटीज,श्वास की बीमारी ,दिल की बीमारी आदि। यही नहीं मोटापे से कई सारी बीमारियों के होने की संभावना भी बढ़ जाती है।

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मोटापे का कारण – हमारे दैनिक जीवन में नियमित व्‍यायाम ( योग) नहीं करना या आवस्यकता से कम शारीरिक मेहनत करना। इसके अलावा मोटापे के कारण है जरूरत से ज्यादा खाना जिसमें मसालेदार व तलीभुनी चीजें शामिल हों। इसके एक और अहम् कारण है कि मनुष्य का पर्याप्त नींद न लेना याअत्यधिक नींद लेना। एक स्वस्थ मनुष्य को प्रतिदिन 8 घंटे की नींद लेनी चाहिए। वहीं अत्यधिक शराब का सेवन और विभिन्न तरह की बिमारियों में दवाईयों के सेवन से भी मोटापा बढ़ जाता है।

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मोटापे का लक्षण –
मोटापा शरीर के साथ – साथ आपको भी प्रभावित करता है जो आप सोचते हो की त्वचा पर मोटी परत का होना कोई विशेष बात नहीं है। लेकिन आप ने कभी सोचा भी है कि इससे कई गंभीर परिणाम हो सकती है। तो आइए हम आपको बता दें कि मोटापे का क्या लक्षण है।

  • सांस फूलना
  • ज्यादा पसीना आना
  • खर्राटे लेना
  • आलस्य करना
  • थकान महसूस करना
  • जोड़ो और पीठ में दर्द होना
  • आत्मविश्वास में कमी का अनुभव करना
  • अकेलेपन का अहसास होना
    अगर आपको यह सारे लक्षण दिखाई दे तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेनी चाहिए समय -समय पर फिट रहने के लिए स्वास्थ्य का जाँच करानी चाहिए।
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मोटापा से कैसे करें बचाव –
अगर आप मोटे हैं और आपका वजन सामान्य से अधिक है तो मोटापे कि इस समस्या को जितना जल्दी हो सके कंट्रोल कर लेना चाहिए। क्योंकि मोटापे के कारण शरीर का वजन तो बढ़ता ही है परन्तु साथ ही साथ अनेक बीमारियां भी शरीर को घेर लेती हैं। इसके लिए निम्नलिखित उपाय पर ध्यान देना चाहिए।

  • सबसे जरूरी बात बाहर का तला भुना खाना बिलकुल बंद कर दीजिये और घर का सादा और संतुलित भोजन करना प्रारम्भ कर दीजिये।
  • फ़ास्ट फ़ूड और पैकेट फ़ूड को बिलकुल ही कम मात्रा में लें।
  • सुबह का नाश्ता टाइम पर करें, दोपहर का खाना भी समय से खाएँ और रात का भोजन सोने से 2 घंटा पहले खा लें
  • खाने को एक ही बार ठूस-ठूस कर नहीं खाएं और अपने दिनभर के आहार को पांच हिस्सों में बाँट लें।
  • फल और हरी सब्जियों को अपने भोजन में शामिल करें।
  • व्यायाम,योग,मोर्निंग या इवनिंग वाक जो भी आपके लिए उचित लगें। इसे अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी का हिस्सा बना लें ।
  • हमेशा सुबह की शुरआत पानी गर्म से करें।

गर्मियों में बढ़ सकती हैं अस्थमा (दमा) की समस्या

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वैसे तो अस्थमा ठंड के मौसम में ज्यादा होता है लेकिन गर्मीयो में गर्म हवाओं के साथ -साथ धूलकण और प्रदूषण ने अस्थमा रोगियों के लिए काफी मुशीबत वाला होता है। इस मौसम में कूलर तथा एसी का ज्यादा प्रयोग, आइसक्रीम,और कोल्ड ड्रिंक के ज्यादा इस्तेमाल से भी अस्थमा का प्रकोप बढ़ा सकता है। इसलिए इस मौसम में भी सावधानी बरतनी चाहिए।

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अस्थमा क्या है – अस्थमा फेफड़े की बीमारी है, जिसमें वायुमार्ग सिकुड़ जाता है, अस्थमा होने पर इन नलियों में सूजन आ जाती है और गले से काफी अधिक बलगम (कफ) निकलने लगता है। इस बीमारी की वजह से खांसी,गले में घरघराहट, सांस लेने में कठिनाई, बेचैनी महसूस होना, दम घुटने-सा अनुभव होना और दौरा पड़ने पर नलिकाएं बंद हो जाती हैं।अस्थमा के मरीज को अटैक पड़ने पर सांस लेने की दिक़्क़त होती है जो कि कभी कभी जानलेवा भी हो सकता है। आजकल यह बीमारी आम हो गई है अस्थमा मुख्य रूप से दूषित हवा के कारण तथा एलर्जी के बढ़ जाने पर होता है।

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क्या है मुख्य वजह अस्थमा के
प्रदूषण और धूलकण – बदलते मौसम और हवाओं में बढ़ रहे प्रदूषण के चलते अस्थमा जैसी बीमारी तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में धूल भरी हवाएं और हवा में उड़ते कण अस्थमा रोगियों के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं। इसे नियंत्रित न कर पाने की स्थिति में यह जानलेवा साबित हो सकता है। प्रदूषण के कारण बच्चों को अस्थमा होने की आशंका ज्यादा होती है तथा इस तरह के मौसम में अस्थमा रोगियों के साथ बहुत ही सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है।और समय -समय पर उपचार व परहेज करने पर इसके असर को नियंत्रित कर सकते हैं।

बदलते मौसम के कारण – बदलता मौसम के कारण अस्थमा के मरीजों की तकलीफ बढ़ सकता है । कभी धूप और कभी बारिश की वजह से इंफेक्शन हो सकता है । डॉक्टर के अनुसार गर्मी के मौसम में अस्थमा रोगियों कि दिखातें भी बढ़ सकती हैं।

संक्रमण – गर्मी में प्रदूषण से व्यक्ति के गले व नाक में संक्रमण हो सकता है, जिससे अस्थमा मरीज को सांस लेने में दिक्कत होती है। और मरीज को बड़ी प्रॉबल्म भी हो सकती है।

सर्द -गर्म की समस्या – गर्मी हो या सर्दी दोनों मौसम में व्यक्ति अस्थमा के रोगों से ग्रस्त हो सकता है दरअसल,गर्मी के मौसम में जरा सी भी गर्मी लगने पर एयर कंडीशन या अन्य माध्यम से शरीर को ठंडा रखते है वहीं अस्थमा रोगी के शरीर का तापमान अचानक गर्म होना और अचानक ठंडा होने से सर्द -गर्म होने से शरीर में एलर्जी हो सकती है, जिससे अस्थमा अटैक की संभावना बढ़ सकती है।

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ठंडी चीजों को खाना – बच्चें अधिकतर बाहर धूप से आने के बाद तुरंत ठंडा पानी आइसक्रीम, बर्फ के गोले व अन्य चीजें खा लेते हैं। गर्मी में ठंडी चीजों की वजह से बच्चों में खांसी, कफ व गले का इंफेक्शन ज्यादा हो जाती है सामान्य बच्चों की अपेक्षा अस्थमा मरीज को इंफेक्शन के कारण सांस लेने में दिक्कत होने लगती है और दिन में कई बार स्प्रे को यूज करना पड़ता है ।

अस्थमा (दमा) से बचाव-

  • अस्थमा के रोगियों को विशेषकर खाने -पीने में ध्यान देना चाहिए ।
  • तुरंत बाहर से आने के बाद ठंडी चीजों का सेवन न करें ।
  • बाहर निकलने से पहले मुंह पर कपड़ा जरूर बांधे।
  • गले में कफ, बलगम,गरगराहट की आवाज होने पर, सांस लेने में तकलीफ आदि विकार फेफड़े की
    क्रिया को प्रभावित करते हैं। ऐसी स्थिति के होने पर तुरंत डॉक्टर के पास जाएं ।
  • गर्मी में बच्चों को बचाएं।
  • अस्थमा की दवाई हमेशा अपने साथ रखें ।
  • इंफेक्शन होने पर डॉक्टर को दिखाएं ।

एड्स और उससे बचाव के तरीके

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पिछले दशकों में एड्स का नाम सबसे खौफनाक बीमारी के तौर पर दर्ज है। यह किस आलम तक खतरनाक है, यह आप इस बात से ही समझ सकते हैं कि अभी तक इसका किसी भी प्रकार का इलाज संभव नहीं हो सका है। ऐसा नहीं है कि केवल एड्स ही एकमात्र खतरनाक बीमारी है, बल्कि कैंसर जैसी और खतरनाक बीमारियां भी हैं, लेकिन उनका इलाज कहीं ना कहीं संभव है और मरीज को एक उम्मीद सी बनी रहती है। लेकिन एड्स हो जाने की स्थिति में मरीज की उम्मीद ही खत्म हो जाती है और वह अपने अंत समय के लिए घड़ियां गिनता रह जाता है।

बहरहाल इससे बचाव के लिए ‘वर्ल्ड ऐड्स वैक्सीन डे’ प्रत्येक साल 18 मई को आयोजित किया जाता है और इस अवसर पर लोगों को जागरूक किया जाता है। बहुत सारे लोग इसके बारे में जानते भी हैं किंतु इतने खतरनाक रूप के बारे में जागरूकता लगातार फैलानी चाहिए ताकि जरा सी भी असावधानी न रह जाए।

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एड्स के कारणों के बारे में अधिकांश लोग जानते ही हैं और यह बिना प्रोटेक्शन के किसी के साथ सेक्स करने की स्थिति में सबसे ज्यादा फैलता है। बेहद आवश्यक है कि जब भी आप किसी अनजान के साथ संभोग करें तो पूरी तरह से प्रोटेक्शन का इस्तेमाल करें। इसीलिए आप देखते होंगे कि वेश्यावृत्ति करने वाले क्षेत्रों में कंडोम का बड़े स्तर पर प्रचार प्रसार किया गया है। वैसे इस तरह के असुरक्षित सेक्स से बचना चाहिए और अब तो यह ट्रेंड चला है कि शादी से पहले लोग एक दूसरे का एचआईवी टेस्ट कराने लगे हैं।

बदलते जमाने के हिसाब से इसे बिल्कुल भी गलत नहीं मानना चाहिए।

इसी प्रकार से दूसरा बड़ा कारण है सिरिंज या सुई का बार-बार इस्तेमाल करना। इससे भी संक्रमण फैलता है, खासकर तब इसकी संभावना ज्यादा हो जाती है जब किसी एचआईवी से पीड़ित व्यक्ति में प्रयोग की गई सुई आप किसी स्वस्थ व्यक्ति को इंसर्ट करते हैं। ऐसे में बेहद आवश्यक है कि जब कहीं भी डॉक्टर के पास या किसी टैटू गुदवा ने वाले के पास आप जाएं तो फ्रेश सुई के इस्तेमाल के प्रति निश्चिंत हो लें। हालांकि वर्तमान में तमाम डॉक्टर जागरूक होने लगे हैं किंतु एक नागरिक के तौर पर आपको भी इन चीजों का ध्यान रखना चाहिए।

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एड्स फैलने के अन्य कारणों में संक्रमित योनि स्राव, वीर्य और खुले घाव का संपर्क मुख्य माना जाता है। अगर कोई औरत संक्रमित है और वह अपने बच्चे को जन्म देते हुए दूध पिलाती है तो उसे भी यह बीमारी फैल सकती है। इसीलिए आजकल प्रेग्नेंट महिलाओं का एचआईवी टेस्ट अनिवार्य होने लगा है।

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बचाव के तरीके अजमाना एड्स के लिए थोड़ा लाभदायक है हालांकि अगर इसका वायरस शरीर में हावी हो गया तब इसे कंट्रोल करना लगभग नामुमकिन सा ही है। एड्स के उपचार में एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी और इसी से संबंधित दवाइयां प्रयोग में लाई जाती हैं। सबसे बड़ी बात होती है, यह दवाइयां भी वायरस को खत्म नहीं करती हैं, बल्कि उसके प्रभाव को कुछ हद तक सीमित कर देती हैं और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने की कोशिश करती हैं। जैसा कि हम सबको पता है कि एड्स कोई अलग रोग नहीं है बल्कि शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को यह समाप्त कर देता है और कोई भी रोग अगर आपको होता है ऐसी स्थिति में वह ठीक ही नहीं होता है। तो जाहिर तौर पर इससे बचने और इसके प्रति जागरूकता फैलाने का प्रयास जारी रहना चाहिए। क्योंकि अगर आप एड्स से सुरक्षित रहना चाहते हैं तो इससे बचाव और इसका उपचार बेहद आवश्यक है।

गर्मियों में अदरक क्यों नहीं खाना चाहिए?

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अदरक एक ऐसे मसाले के तौर पर यूज किया जाता है जो स्वाद बढ़ा देता है, खासकर चाय में अदरक के दीवानों की संख्या कम नहीं है। कई जगह पर तो चाय अदरक के बिना बनती ही नहीं है और कई लोग ऐसे भी हैं जो मसालेदार खानों में अदरक का सेवन भरपूर मात्रा में करते हैं। वैसे तो अदरक लाभदायक भी है किंतु बात जब गर्मियों की होती है तब मामला थोड़ा बदल जाता है। अगर गर्मियों में भी आप अदरक का ढ़ेर सारा सेवन करते हैं तो यह आपके लिए नुकसानदायक हो सकता है। आइए देखते हैं कैसे-

गैस्ट्रोइनटेस्टाइनल से हो जाएंगे परेशान
गर्मियों में अदरक का ज्यादा सेवन करने से आपके हेल्थ पर नेगेटिव इंपैक्ट पड़ना स्वाभाविक है। बताया जाता है कि अदरक के अधिक सेवन से दस्त और हार्टबर्न जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसके अतिरिक्त शरीर में भारी मात्रा में एसिड जमा हो जाता है और जाहिर तौर पर इसे एसिडिटी और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल जैसी समस्या स्वाभाविक रूप से होती है।

गाल ब्लैडर की बड़ी समस्या
आपको यह जानकर आश्चर्य लगेगा, लेकिन अदरक का अधिक मात्रा में सेवन करने से यह पित्त की थैली में समस्या बढ़ा देता है। गर्मी में अत्यधिक अदरक खाने से पित्तस्राव बढ़ जाता है और अगर पित्ताशय का रोग है तो इससे पीड़ित लोगों को और भी समस्या होती है। लेडीस को खासतौर पर गर्मियों में अदरक से बचने की सलाह दी जाती है क्योंकि यह गर्भपात तक कर सकता है।

Pic: healthline

कब्ज
जाहिर तौर पर अदरक गर्म तासीर का होता है और एसिडिटी इससे बढ़ती ही है। इसके ज्यादा सेवन से सीने में जलन और कब्ज इस के सामान्य लक्षण हैं, तो इससे ग्लाइसीमिया की शिकायत होने की संभावना भी बढ़ जाती है। गर्मियों में अदरक का सेवन उन रोगियों के लिए घातक हो जाता है जो खून के थक्के को रोकने के लिए दवा ले रहे होते हैं। निश्चित रूप से यह खून को पतला भी करता है।

कम रक्तचाप होना
जी हां! अगर आप अदरक की चाय भारी मात्रा में पीते हैं तो आपका ब्लड प्रेशर कम हो जाता है और अगर आप पहले से ही लो ब्लड प्रेशर का सामना कर रहे होते हैं तब भारी मात्रा में आपका ब्लड प्रेशर कम हो जाता है और ऐसी स्थिति में आपको डॉक्टर का चक्कर लगाना पड़ सकता है।

तो गर्मियों में अदरक के सेवन से बचने की सलाह दी जाती है और इसके वाजिब कारण भी आपको समझ आ गए होंगे। हां आप कम मात्रा में अपने स्वास्थ्य की जरूरतों के अनुसार इसका प्रयोग अवश्य कर सकते हैं, किंतु गर्मियों में इससे बचें तो ज्यादा बेहतर होगा।

खराब नींद और मेंटल हेल्थ का अंतर्संबंध

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खराब नींद आपके मानसिक स्वास्थ्य को बरबाद कर सकती है। यह बात कई शोध में साबित हो चुकी है। अगर आपका मानसिक स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है तो आप यह बात जान लें कि आप कोई भी कार्य ढंग से नहीं कर पाएंगे। खराब नींद के कई मायने होते हैं और आखिर यह किस प्रकार आपके मानसिक स्वास्थ्य को डिस्टर्ब कर सकता है, आइए देखते हैं।

स्लीप एक जानी-मानी पत्रिका है और इसमें नींद पर एक शोध हुआ था। इस शोध में तकरीबन 165 लोग शामिल किए गए थे जिनकी उम्र 31 वर्ष तक थी। इसमें 52% पुरुष शामिल थे। खास बात यह है कि यह लोग 2010 में आए भूकंप की वजह से अपना घर खो चुके थे और उसके बिना जीवन बसर कर रहे थे। नींद की गड़बड़ी तीन लोगों में बड़े स्तर पर पाई गई और यह शोध किया न्यू यॉर्क यूनिवर्सिटी के जु़डिक ब्लैंक ने। जाहिर तौर पर परिणाम बेहद निराशाजनक थे।

इन लोगों में पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) जैसे लक्षण पाए गए और कई लोगों में तो अवसाद और डिप्रेशन तक देखा गया था। निश्चित रूप से जो लोग सो नहीं पाते थे वह तनाव में रहते थे और यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि तनाव, मानसिक-स्वास्थ्य से सीधा जुड़ा होता है। उपरोक्त शोध से यह भी निष्कर्ष निकाला गया कि अगर आपके सामने कोई बड़ी समस्या आई हो तो उसका असर लंबे समय तक रहता है और निश्चित रूप से ऐसे में नींद-संबंधी तमाम परेशानियां आपको हो सकती हैं।

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इस शोध से इतर भी देखें तो नींद न आने से चिड़चिड़ापन होना सामान्य सी बात है। कई लोग कम नींद की वजह से इतने परेशान होते हैं कि उनको डॉक्टर तक को दिखाने की आवश्यकता पड़ जाती है। निश्चित रूप से अगर आप ऐसी किसी समस्या का सामना कर रहे हैं तो डॉक्टर से सलाह लेने में जरा भी कोताही नहीं करनी चाहिए।

हालांकि बेहतर यह है कि आप 6 से 8 घंटे की नींद प्रतिदिन अवश्य लें और उस दौरान आपके आसपास का माहौल शांत हो। यह ज्यादा आवश्यक है! कई बार क्या होता है कि 6 से 8 घंटे अब बेड पर लेटे जरूर होते हैं, लेकिन नींद आपकी आंखों से दूर होती है। वहीं कई बार ऐसे लोगों को भी देखते होंगे जो चार-पांच घंटे में ही अपनी नींद पूरी कर लेते हैं।

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निश्चित रूप से यह एकाग्रता का प्रतिफल है। स्मार्टफोन युग में जिस प्रकार से लोगों के बिस्तर तक में यह घुस चुका है वह अपने आप में चिंता का विषय है। आज लोग दिन भर स्मार्टफोन से तो चिपके ही रहते हैं किंतु जब वह बिस्तर में जाते हैं तब भी वह घंटों तक टाइम पास करते हैं। इसे टाइमपास ही कहा जाएगा, हालांकि मनोरंजन के नाम पर थोड़ा टाइम बिताना और एक लंबे समय तक स्मार्टफोन से चिपके रहना इन दोनों में खासा फर्क है।

जाहिर तौर पर ऐसी स्थिति में आपको नींद कम आती है और आपको बेचैनी घेरी रहती है, जिसका परिणाम अंततः आपके मेंटल हेल्थ पर पड़ता है। इसके अतिरिक्त आप को वह सारे जतन करने चाहिए, जिससे आपकी नींद पूरी हो, ताकि आपका मानसिक स्वास्थ्य उत्तम बना रह सके।

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इन उपायों में यह भी कहा जाता है कि सोने से पहले कम से कम 4 से 6 घंटे तक शराब नहीं पीना चाहिए, क्योंकि अल्कोहल की मात्रा आपकी नींद तुरंत तोड़ देती है। इसी प्रकार बिस्तर पर जाने से 4 से 6 घंटे पहले काफी, चाय, सोडा, चॉकलेट इत्यादि लेने से परहेज करें।

जाहिर तौर पर एक्सरसाइज करना जरूरी है लेकिन बिस्तर पर जाने से ठीक पहले ऐसा ना करें। बिस्तर आपका आरामदायक होना चाहिए और सोने से ठीक पहले गर्म दूध और केले लेने से आपको नींद अच्छी आती है। किंतु यह आवश्यक है कि अगर आप अपने मानसिक स्वास्थ्य को दुरुस्त रखना चाहते हैं तो किसी भी स्थिति में बेहतर नींद लेने का जतन करें।

हाई ब्लड प्रेशर और घरेलू उपचार

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ब्लड प्रेशर की समस्याएं आज के समय में आम हो गई हैं और अगर इस समस्या को अनदेखा किया जाता है तो यह दिल की बीमारियों में परिवर्तित हो जाता है। इसके अतिरिक्त चिड़चिड़ापन और तनाव इस समस्या में आम है। इसीलिए समय रहते इस समस्या पर ध्यान दिया जाना चाहिए। इसके लिए न केवल आपको डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए बल्कि घरेलू उपचारों को भी आजमाना चाहिए जिनका कोई भी साइड इफेक्ट नहीं होता।

आइए देखते हैं घर पर आप किस प्रकार से हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने के तरीके आजमा सकते हैं-

लहसुन हाई ब्लड प्रेशर की समस्या में रामबाण हो सकता है। इसे आप सुबह खाली पेट चबा चबा कर एक गिलास पानी के साथ निगल लें। अगर आपको चबाने में समस्या आ रही है तो आप इसे निगल भी सकते हैं या फिर इसका रस निकाल कर थोड़ा पानी (20 से 25 एम एल) के बीच मिलाकर पी सकते हैं।

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लहसुन की भांति ही अजवाइन और मेथी भी हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए बेहद उपयोगी है। इसके लिए आपको एक स्पून मेथी और अजवाइन पाउडर को पानी में भिगोकर रखना पड़ेगा और सुबह आप इस पानी को पी लें तो आपकी हाई ब्लड प्रेशर की समस्या काफी हद तक हल हो जाएगी।

हाई ब्लड प्रेशर रोगियों को अपने शरीर की मालिश भी करानी चाहिए ताकि ब्लड सरकुलेशन बेटर ढंग से शरीर में हो सके। जब आपका ब्लड सरकुलेशन सही होता है तो आपको उच्च रक्तचाप नियंत्रित करने में खासी मदद मिलती है। इसीलिए 1 सप्ताह में कम से कम चार से पांच बार आप पूरे शरीर पर तेल से मालिश कराने की कोशिश करें।

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व्यायाम और खासकर प्राणायाम उच्च रक्तचाप में बेहद लाभकारी होता है। आप टेलीविजन पर या फिर यूट्यूब पर भी कई ऐसे प्राणायाम आसनों को देख सकते हैं जो हाई ब्लड प्रेशर में आपके लिए उपयोगी हो सकते हैं।

इसी प्रकार खानपान में आपको सावधानी रखनी पड़ेगी और हाई ब्लड प्रेशर पेशेंट्स को भोजन में नमक कम ही खाना चाहिए। अगर नमक की मात्रा भोजन में ज्यादा होगी तो हाई ब्लड प्रेशर और बढ़ेगा, इसीलिए इसे बेहद नियंत्रित मात्रा में इस्तेमाल करें।

दूध में दालचीनी और हल्दी मिलाकर अगर आप इसका नियमित सेवन करते हैं तो हाई ब्लड प्रेशर की समस्या से निजात पाने में आपको निश्चित रूप से मदद मिलेगी।

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एक और उपचार के तहत आप त्रिफला का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके लिए आपको 20 से 25 ग्राम त्रिफला पानी में भिगोकर रात भर के लिए रखना पड़ेगा, फिर सुबह होने पर इसमें 2 चम्मच पानी मिलाकर आप इसका सेवन करें और इस तरीके से आप हाईब्लड प्रेशर की समस्या से राहत पा सकते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आपको अपनी लाइफ स्टाइल में सकारात्मक बदलाव भी करना चाहिए जैसे आप समय से सोएं और पर्याप्त नींद लें। इसके अतिरिक्त योगा को भी अपनी जीवनशैली में स्थान दें और इस तरीके से हाई ब्लड प्रेशर को आप हरा सकेंगे।

क्या है हाइपरटेंशन और कितना जानते हैं आप इसके बारे में?

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हाइपरटेंशन नाम सुनकर कई लोगों को ऐसा लगेगा कि यह कोई साधारण सी बीमारी होगी या कोई तनाव का दूसरा रूप होगा। किंतु आप को इस लेख से पहले ही बता दें कि हाइपरटेंशन के रोगियों में हार्ट अटैक का खतरा सबसे ज्यादा होता है। सिर्फ इसी से आप इसकी गंभीरता का अंदाजा लगा सकते हैं! वास्तव में हाइपरटेंशन होता कैसे है और इससे बचाव के क्या कारण हो सकते हैं और इसके लक्षण क्या होते हैं, आइए देखते हैं।

सच कहा जाए तो हाइपरटेंशन के पीछे सबसे बड़ा कारण होता है अनियंत्रित खानपान और तनाव। निश्चित रूप से यह किसी भी व्यक्ति में हो सकता है और इसके पीछे कोई भी कारण हो सकता है। हाइपरटेंशन में मैक्सिमम हाई ब्लड प्रेशर की समस्या होती है जिससे आप की नसों में रक्त का दबाव बढ़ जाता है। इसकी वजह से दिल की धड़कन तेज होने लगती हैं। जाहिर तौर पर इसका सबसे ज्यादा नुकसान आपके हृदय पर होता है।

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वास्तव में हाइपरटेंशन के कई कारण हो सकते हैं जिसमें कम नींद लेना, अत्यधिक गुस्सा करते रहना, नॉनवेज खाते रहना, ज्यादा ऑइली खाना और मोटापा इत्यादि शामिल हैं। पर एक बार जब आपको हाइपरटेंशन की प्रॉब्लम शुरू हो जाती है तो फिर यह घटने की बजाय बढ़ने ही लगती है।

हाइपरटेंशन के लक्षणों की बात करें तो सबसे बड़ा लक्षण है कि इस के पेशेंट को सांस लेने में तकलीफ होती है और इसके अतिरिक्त पेशेंट के सिर के पीछे और गर्दन में काफी दर्द रहने लगता है। यह सब शुरुआती लक्षण हैं, किन्तु जैसे जैसे समय निकलता है, वैसे वैसे मरीज को धुंधला दिखने लगता है, साथ ही पेशाब के साथ खून तक निकलने लगता है।

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इसी तरह आगे लक्षणों की बात की जाए तो थकान और सुस्ती के साथ सिर चकराना इसमें आम बात है। निश्चित रूप से रात में नींद ना आने की समस्या भी होने लगती है और इसी वजह से दिल की धड़कनें भी बढ़ जाती हैं।

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हाइपरटेंशन से बचने के लिए आपको अपनी जीवनशैली नियमित करने की जरूरत पड़ती है। इसी के साथ अगर आप अपनी लाइफ स्टाइल में योग और प्राणायाम को शामिल करते हैं, आयली खाना कम करते हैं और पर्याप्त नींद लेते हैं तो निश्चित रूप से आपको इसमें मदद मिल सकती है। लेकिन जैसे-जैसे समस्या बढ़ती है तो आप डॉक्टर से सलाह लेने में कतई परहेज न करें।

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